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सबसे बड़ी फ़िक्र: ईमान, तड़प और तबलीग़
नबी की सीरत की रोशनी में ज़मीर का मुहासबा
ग़ौर कीजिए कि किसी इंसान का ध्यान किस चीज़ में लगा रहता है, आपको उसकी फ़िक्र का क़द दिख जाएगा। फ़िक्र जितनी बड़ी होती जाती है, बाक़ी सब कुछ उतना ही छोटा पड़ता जाता है और आख़िरकार भुला दिया जाता है। तो हमारे दौर की सबसे बड़ी फ़िक्र क्या है, और हम उसके लिए कितने बेचैन हैं?
यह लेख ऊपर दिए गए वीडियो के साथ सीन-दर-सीन चलता है। लेख की भाषा हर पाठक के लिए है; चार्ट, तुलनाएँ और आयतों का तर्जुमा खुलने वाले बक्सों में दिए गए हैं।
I — बड़ी फ़िक्रों का साया
बड़ा दर्द रोज़मर्रा की हर बात पर छा जाता है
इंसान किस चीज़ में उलझा रहेगा और दुनिया की किन बातों को भूल जाएगा, यह उसके सामने खड़ी फ़िक्र का क़द तय करता है। फ़िक्र जितनी बड़ी हो, बाक़ी सब कुछ उतना ही भुला दिया जाता है।
📖 दो मिसालें
शारीरिक ख़तरा: जिसकी टाँग कटने का ख़तरा सिर पर मँडरा रहा हो, वह उस दिन घर में क्या पका है इसकी बातें करे, यह सोचा भी नहीं जा सकता।
पारिवारिक संकट: जिसका जीवनसाथी लापता हो गया हो, उसे अपने जूते चमकाने की परवाह न रहे, यह बिल्कुल स्वाभाविक है।
II — हमारे दौर की सबसे बड़ी फ़िक्र
हर दौर की अपनी एक बड़ी फ़िक्र होती है
किसी दौर में सभ्यताएँ खड़ी करना सबसे अहम रहा, किसी दौर में दुनिया जीतना, तो किसी दौर में भौतिक ख़ुशहाली लाना। लेकिन जिस दौर में हम जी रहे हैं, उसकी सबसे बड़ी फ़िक्र है इंसानों को नफ़्स की ख़्वाहिशों के भँवर से निकालकर ईमान तक पहुँचाना, और अल्लाह की मर्ज़ी को ज़िंदगी में उतारना।
📖 चार्ट: फ़िक्रों की सीढ़ियाँ
सीढ़ी जितनी ऊपर जाती है, फ़िक्र का वज़न उतना ही बढ़ता जाता है। सबसे ऊँचे पायदान पर है ईमान को बचाना।
III — ज़मीर का आईना
एक ही मंज़र को देखते दो दिल
हाथ से निकल चुकी एक पीढ़ी, और दीन से दूर होते लोग... इस मंज़र को देखकर जिसके दिल में गहरी तड़प उठती है, उसके सीने में ज़मीर ज़िंदा है। वहीं सुस्ती, बेपरवाही और बेहिसी इस बात की निशानी हैं कि दिल और ज़मीर ने अपना काम करना छोड़ दिया है; यह एक रूहानी सड़न है।
बेहिसी के नीचे एक छिपी हुई सच्चाई दबी होती है: इस राह के अंजाम पर मन ही मन शक करना। ईमान की पहली और सबसे ज़ाहिर निशानी वह छटपटाहट है जो खोए हुओं को बचाने के लिए दिखाई देती है। अगर यह छटपटाहट नहीं, तो समझिए ईमान की बुनियाद हिल चुकी है।
📖 निदान तालिका: दो प्रतिक्रियाएँ और उनकी जड़ें
| ज़िंदा ज़मीर | बेहिसी | |
|---|---|---|
| प्रतिक्रिया | दिल में गहरी तड़प और ग़म | सुस्ती, बेपरवाही और बेहिसी |
| निदान | इस बात का सबूत कि अक़्ल और दिल की रहनुमाई में फ़ितरी सलाहियतें सलामत हैं | फ़ितरत का नुक़सान: दिल और ज़मीर का काम करना बंद कर देना, रूहानी सड़न |
बेहिसी की तीन जड़ें
- दोबारा ज़िंदा उठाए जाने, यानी हश्र पर पूरा यक़ीन न होना
- यह न मानना कि अल्लाह के सामने हिसाब देना होगा और आमाल मीज़ान पर तौले जाएँगे
- हमेशा रहने वाली जन्नत की ख़ुशियों और हमेशा रहने वाली जहन्नम के वजूद पर शक करना
IV — नबी की तड़प
"मुझे नहीं मालूम... मेरी फ़िक्र बहुत बड़ी है!"
हमारे नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के लिए ज़िंदगी की पहली घड़ी से ही सबसे बड़ी फ़िक्र ईमान को बचाना थी, और इस मक़सद के आगे आपने दुनिया की किसी चीज़ को अहमियत नहीं दी। जब लोगों ने आपसे कहा, "आपका सिर फट गया, दाँत टूट गया, आपको अपने वतन से निकाल दिया गया, आपने अपनी और अपनी बीवी की सारी दौलत लुटा दी!", तो आपका जवाब एक ही था: "मुझे नहीं मालूम... मेरी फ़िक्र बहुत बड़ी है!"
वे ईमान नहीं लाते, इसलिए क़रीब है कि आप अपनी जान ही दे बैठें, ग़म से ख़ुद को हलाक कर लें।
सूरह अश-शुअरा, आयत 3
यह आयत नबी के ज़मीर और ईमान से भरे दिल का सबसे ऊँचा इज़हार है। जिस रूह को भी बचाया न जा सके, उसके लिए उठने वाले दम घोंट देने वाले ग़म की यह इलाही तस्दीक़ है।
V — अबू तालिब का क़िस्सा
चालीस बरस की हिफ़ाज़त, और वह एक बात जो ज़ुबान पर न आई
अबू तालिब ने चालीस बरस तक हमारे नबी की हर जानलेवा ख़तरे से हिफ़ाज़त की। मगर यह उन्होंने आपकी नबूवत पर ईमान की वजह से नहीं, बल्कि रिश्तेदारी, शफ़क़त और ख़ून के रिश्ते के जज़्बे से किया। अगर वे यह नबूवत की ख़ातिर करते, तो उनके दिल की बर्फ़ पिघल जाती और वे भी ईमान के दरिया में घुल जाते।
मौत की घड़ी में हमारे नबी उनके सिरहाने बैठे थे: "चचाजान! मैं आपसे ज़्यादा कुछ नहीं माँगता। बस ला इलाहा इल्लल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं) कह दीजिए, ताकि क़यामत के दिन मैं आपकी शफ़ाअत कर सकूँ।" दूसरी तरफ़ मुशरिक कह रहे थे: "क्या तुम अपने बाप-दादा के दीन से, अब्दुल मुत्तलिब के दीन से फिर जाओगे?" पुराने ख़यालों की ज़िद में जकड़े अबू तालिब ने, जबकि एक मुसलमान के आख़िरी बोल कलिमा-ए-तौहीद होते हैं, कहा: "मैं अब्दुल मुत्तलिब के दीन पर मरता हूँ", और यह मौक़ा हमेशा के लिए गँवा दिया।
अबू तालिब का इंतिक़ाल हुआ तो हमारे नबी ऐसे टूट गए, मानो जिस इमारत में थे उसकी छत सिर पर आ गिरी हो, और फ़रमाया: "जब तक मुझे इजाज़त रहेगी, मैं आपके लिए इस्तिग़फ़ार (माफ़ी की दुआ) करता रहूँगा।" फिर इलाही हद सामने आई: आप जिसे चाहें, उसे हिदायत नहीं दे सकते। अल्लाह की मर्ज़ी ख़ून के रिश्ते को नहीं, अल्लाह की तरफ़ दिल के झुकाव को देखती है। मोमिन का काम तबलीग़ है; हिदायत तो सिर्फ़ अल्लाह के हाथ में है।
📖 चालीस बरसों का बारीक जायज़ा और इलाही हद
| अमल | चालीस बरस तक हमारे नबी की हर जानलेवा ख़तरे से हिफ़ाज़त की और आपकी ख़िदमत की। |
| नीयत | नबूवत पर ईमान नहीं; बल्कि रिश्तेदारी, शफ़क़त और ख़ून का रिश्ता। |
| विश्लेषण | अगर यह नबूवत की ख़ातिर होता, तो दिल की बर्फ़ पिघल जाती और वे भी ईमान के दरिया में घुल जाते। |
| आख़िरी घड़ी | हिफ़ाज़त का एहसान बिना बदले के न रह जाए, इसलिए चचा के सिरहाने हमारे नबी का वह आख़िरी और सबसे उम्मीद भरा इंतज़ार। |
इलाही हद (सूरह अत-तौबा, आयत 113): नबी और ईमान वालों के लिए यह मुनासिब नहीं कि वे मुशरिकों के लिए माफ़ी की दुआ करें, चाहे वे रिश्तेदार ही क्यों न हों, जबकि उन पर ज़ाहिर हो चुका हो कि वे जहन्नमी हैं।
इंसान की कोशिश असर का एक दायरा है; हिदायत तो इलाही हद के अंदर ही रहती है।
VI — लगन का विरोधाभास
क्या एक पार्टी नेता जितनी भी अहमियत नहीं?
किसी सियासी पार्टी का कार्यकर्ता अपने नेता के मक़सद के लिए वोट जुटाने को गाँव-गाँव, क़स्बा-क़स्बा बिना थके घूमता है। वहीं मोमिन, सारे जहानों के रब और उसके रसूल से जुड़े होने का दावा करते हुए भी, लोगों के अख़लाक़ से गिरने और दीन से दूर होने पर बेपरवाह रह सकता है।
क्या आपकी नज़र में अल्लाह और उसके रसूल की अहमियत एक पार्टी नेता जितनी भी नहीं? अगर आप गाँव-गाँव घूमकर लोगों को अल्लाह के बारे में नहीं बताते, तो समझिए हमारे दिल सड़ चुके हैं।
📖 तुलना: दुनिया के लिए और आख़िरत के लिए कोशिश
| पार्टी कार्यकर्ता | मोमिन | |
|---|---|---|
| केंद्र | पार्टी नेता (फ़लाँ-फ़लाँ...) | सारे जहानों का रब और उसके रसूल |
| अमल | वोट जुटाने के लिए गाँव-गाँव, क़स्बा-क़स्बा बिना थके घूमता है। | लोगों के अख़लाक़ से गिरने और दीन से दूर होने पर बेपरवाह रहता है। |
VII — एक रूह का वज़न
लाल ऊँटों से भी बेहतर
ख़ैबर में हमारे नबी ने हज़रत अली की दुखती आँखों को शिफ़ा दिलाने के बाद परचम उनके हाथ में सौंपा और हुक्म दिया: "जो भी तुम्हारे सामने आए, उसे अल्लाह के बारे में बताओ!" तराज़ू के एक पलड़े में लाल ऊँट, मवेशियों के झुंड और बेशुमार दौलत; दूसरे पलड़े में आपके ज़रिए सिर्फ़ एक इंसान का हिदायत पा जाना। किसी एक इंसान के ईमान तक पहुँचने का ज़रिया बनना, दुनिया की हर दौलत और जंग में हाथ आए हर माल से बेहतर है।
यही तराज़ू मुसीबतों को भी तौलता है। किसी एक इंसान के अपने दीन से भटक जाने के सामने, एक पूरे मुल्क का ज़मींदोज़ हो जाना बहुत मामूली घटना है।
📖 मुसीबतों की तुलना: भौतिक तबाही और रूहानी पतन
| भौतिक तबाही (इज़मिर का भूकंप) | रूहानी पतन (दीन से भटकना) | |
|---|---|---|
| नुक़सान की क़िस्म | एक पूरे शहर का ज़मींदोज़ हो जाना, जिस्मानी मौतें | सिर्फ़ एक इंसान का दीन और ईमान से दूर हो जाना |
| आख़िरी अंजाम | अगर उन्होंने अल्लाह की रज़ा हासिल की हो, तो मरने वाले शहीद का दर्जा पाकर सीधे जन्नत जाते हैं। | क़ुरआन और अल्लाह को हमेशा के लिए खो देना; हमेशा जहन्नम में रहना। |
VIII — मोमिन की तबलीग़ का समीकरण
तड़प आपकी प्रेरणा है, तबलीग़ आपका अमल, और सुपुर्दगी आपकी हद
ये सारे क़िस्से एक ही रुख़ पर आकर मिलते हैं: दिल महसूस करता है, अमल हरकत में आता है, और सुपुर्दगी अपनी हद पहचानती है। जहाँ ये तीनों मिलते हैं, वहीं मोमिन का सच्चा रुख़ है।
📖 चार्ट: तीन दायरों का संगम
दिल (तड़प): लोगों को ईमान से ख़ाली देखकर नबी जैसा ग़म और ज़मीर में एक टीस महसूस करना; बेहिसी को ठुकराना।
अमल (कोशिश): हज़रत अली की तरह परचम थामकर, किसी भी सियासी लगन से कहीं आगे बढ़कर, गाँव-गाँव घूमकर पैग़ाम पहुँचाना।
हद (सुपुर्दगी): अबू तालिब के क़िस्से की तरह, नतीजा यानी हिदायत सिर्फ़ अल्लाह के सुपुर्द करना; अपनी ताक़त की हद पहचानना।
इस बड़ी हक़ीक़त के हिस्सेदार बनिए।
हमारे नबी के मक़सद को अपना दर्द बना लीजिए; अल्लाह यही चाहता है। अपनी अक़्ल और अपने ज़मीर की रोशनी में फ़ैसले कीजिए। जो सच्चाइयाँ आपने सुनी हैं, उन्हें फैलाइए, ताकि वे हर कान तक पहुँचें। इस बड़े दर्द के इर्द-गिर्द एकजुट हो जाइए, ताकि आप सब साथ जिएँ और हमेशा की ज़िंदगी में भी साथ उठाए जाएँ।
अल्लाह अपने करम से हमें माफ़ फ़रमाए और सिरात-ए-मुस्तक़ीम (सीधे रास्ते) की हिदायत दे।
आयतों का तर्जुमा
📖 इस लेख में आई आयतें
सूरह अश-शुअरा, आयत 3: वे ईमान नहीं लाते, इसलिए क़रीब है कि आप अपनी जान ही दे बैठें, ग़म से ख़ुद को हलाक कर लें।
सूरह अत-तौबा, आयत 113: नबी और ईमान वालों के लिए यह मुनासिब नहीं कि वे मुशरिकों के लिए माफ़ी की दुआ करें, चाहे वे रिश्तेदार ही क्यों न हों, जबकि उन पर ज़ाहिर हो चुका हो कि वे जहन्नमी हैं।