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इल्म और इरादे की दलील
एम. फ़ेतुल्लाह गुलेन · वाज़ · 28 फ़रवरी 1975 · "तौहीद की दलीलें" सिलसिले का तीसरा वाज़
पिछले दर्स में कहा गया था कि माद्दा अज़ली नहीं है, इसलिए क़दीम और बाक़ी अल्लाह है। इस दर्स में होजाएफ़ेंदी एक क़दम आगे बढ़ते हैं: कायनात का हर काम एक इल्म और एक इरादा चाहता है। मस्जिद, गाड़ी की टक्कर, छापाख़ाना, चालीस हज़ार की फ़ौज, एक प्रोटीन के चालीस हज़ार परमाणु, अपनी झोंपड़ी में बैठा अंधा आदमी और हमारे और सूरज के बीच की दूरी... सब एक ही सवाल पुछवाते हैं: क्या यह इत्तिफ़ाक़ से हो सकता है?
यह लेख ऊपर दिए वीडियो के साथ-साथ, खंड-दर-खंड चलता है। कथन वाज़ जैसा ही है; तालिकाएँ, रिसाला-ए-नूर से मेल और स्रोत-टिप्पणियाँ खुलने वाले बक्सों में हैं। वीडियो में स्क्रीन के नीचे की सुनहरी पट्टियाँ रिसाला-ए-नूर की मुताबिक़ जगहें दिखाती हैं, और नीली पट्टियाँ 1975 में दिए गए आँकड़ों की आज की क़ीमत।
I — वाज़ की आयत
"अपने रब की इबादत करो"
वाज़ बिस्मिल्लाह और सूरह अल-बक़रा की 21-22वीं आयतों से शुरू होता है। सुआत यिल्दिरिम के अनुवाद से: "ऐ लोगो! अपने उस रब की इबादत करो, जिसने तुम्हें और तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया। यूँ तुम हर नुक़सान से बचने की उम्मीद रख सकते हो। वह रब, जिसने ज़मीन को तुम्हारा बिछौना, आसमान को गुंबद बनाया। आसमान से पानी उतारा, उससे तुम्हारे रिज़्क़ के लिए तरह-तरह की फ़सलें निकालीं। तो सच जानते-बूझते अपने रब का कोई शरीक हरगिज़ न ठहराओ!" (अल-बक़रा 2:21-22)
होजाएफ़ेंदी आयत में ज़मीन को "बिछौना" और "दस्तरख़्वान" कहे जाने को दर्स की कुंजी बनाते हैं: अल्लाह ने कायनात को एक किताब की तरह हमारे सामने बिछाया है ताकि हम तफ़क्कुर करें; उसकी नेमतों को चखना भी, जब अल्लाह के नाम पर हो, इबादत है।
📖 आयत के दो पंख
| बंदगी का हुक्म | अपने उस रब की बंदगी करो जिसने तुम्हें और तुमसे पहले वालों को पैदा किया। |
| बिछौना और गुंबद | ज़मीन को बिछौना, आसमान को इमारत बनाने वाला; आसमान से पानी उतार कर रिज़्क़ निकालने वाला वही है। तो उसका कोई शरीक न ठहराओ। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · वाज़ की आयत
बदीउज़्ज़माँ ने भी इस आयत की तफ़सीर की है: "فِرَاشًا: ज़मीन को एक माइदा, यानी एक दस्तरख़्वान बना कर बिछाया है" और "शुक्र तो बस इबादत ही है" (इशारातुल-इजाज़ (Signs of Miraculousness), अल-बक़रा 2:21-22 की तफ़सीर)। ख़तीब के वाक्य "नेमतों के साथ एक दस्तरख़्वान की तरह हमारे सामने रखने वाला" और "चख कर शुक्र करे तो इबादत में गिना जाता है" उसी तफ़सीर की ज़बान हैं।
II — कायनात एक किताब
जो नहीं पढ़ता, वह पीछे रह जाता है
"अल्लाह ने कायनात को किताब की तरह हमारे सामने रखा है, ताकि हम तफ़क्कुर करें।" जिस किताब पर सोचा न जाए, जिसका अध्ययन न हो, ऐसी किताब अल्लाह नहीं लिखेगा; इसलिए जो लोग उस किताब को नहीं पढ़ते, उसकी रचना में छिपी हिकमत को समझ नहीं पाते, वे पीछे हैं, पिछड़े हुए हैं।
होजाएफ़ेंदी का पैमाना साफ़ है: गली में घूमना, फूल सूँघना, फल चखना भी, उस इंसान के हाथ में इबादत में गिना जाता है जो चख कर अपने ख़ालिक़ का शुक्र करता है। सबक़ लेने वाला कामयाब होता है; अल्लाह की नज़र में क़द्र पाता है।
📖 कायनात की किताब कैसे पढ़ी जाए?
| बाग़ की तरह | अल्लाह ने कायनात को एक बाग़ की तरह हमारी आँखों के सामने बिछाया है; अपनी रंग-बिरंगी कैफ़ियत से हमारी नज़रों को सहलाती है। |
| दस्तरख़्वान की तरह | हमारे सामने इसलिए रखी है कि हम नेमतें चखें, हमारी भूख खुले, आख़िरत की नेमतों की चाहत जागे। |
| किताब की तरह | तफ़क्कुर के लिए पेश की गई है; जो नहीं पढ़ता, उसकी हिकमत नहीं समझता, वह पीछे रह जाता है। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · कायनात एक किताब
"कायनात की किताब" रिसाला-ए-नूर की बुनियादी तश्बीह है: मौजूदात "समदानी ख़त" हैं, कायनात "एक बड़ी किताब" है और उसका मक़सद तफ़क्कुर है (सोज़लर (The Words), तीसवें और पच्चीसवें सोज़ में आए बयान)। ख़तीब यही ज़बान अपने वाक्यों में बरतते हैं।
III — क़िदम, वुजूद, बक़ा
माद्दा अज़ली नहीं है
होजाएफ़ेंदी पिछला दर्स याद दिलाते हैं: अल्लाह मौजूद है (वुजूद), उसकी कोई शुरुआत नहीं (क़िदम), और जिसकी शुरुआत न हो उसका अंत भी नहीं होता (बक़ा)। काफ़िर अज़लियत माद्दे और ऊर्जा को देता है; मोमिन अज़लियत और अबदियत अल्लाह को देता है। "हम दें या न दें, अल्लाह क़दीम है।" दलीलें इसलिए हैं कि हमारे दिल में मारिफ़त की सलाहियत पर जमी गर्द पोंछी जाए।
माद्दे के अज़ली न होने को वे तीन रास्तों से दिखाते हैं: ऊष्मागतिकी का नियम बताता है कि सूरज गर्मी खो रहे हैं; एक दिन वे बुझ जाएँगे। जो बुझेगा, उसकी शुरुआत भी है। "मा सबता क़िदमुहू इम्तनअ अदमुहू": जिसका क़िदम साबित हो, उसका फ़ना होना मुहाल है। तो क़दीम माद्दा नहीं, अल्लाह है; माद्दा अल्लाह की क़य्यूमियत से क़ायम है। अज़ल किसी लंबे ज़माने की शुरुआत नहीं; अनंत समय है।
📖 तीन सिफ़तें
| वुजूद | अल्लाह मौजूद है। |
| क़िदम | उसकी कोई शुरुआत नहीं; वह अज़ली है। |
| बक़ा | जिसकी शुरुआत न हो, उसका अंत भी नहीं; वह अबदी है। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · क़िदम, वुजूद, बक़ा
"जो अज़ली है, वह ज़रूर अबदी है। जो क़दीम है, वह ज़रूर बाक़ी है" (मक्तूबात (The Letters), बीसवाँ मक्तूब, आठवाँ कलिमा): यह ख़तीब के क़ायदे "मा सबता क़िदमुहू इम्तनअ अदमुहू" का तुर्की रूप है। अज़ल का "अतीत की कड़ी का एक सिरा" न होना छब्बीसवें सोज़ में; माद्दे को अज़लियत देना और क़य्यूमियत, तीसवें लेमा के इस्म-ए-क़य्यूम वाले बयान में आते हैं। ख़तीब उसी जगह सर्वेश्वरवाद को भी रद्द करते हैं: "माद्दा अल्लाह का ज़ाहिरी रूप नहीं है; यह भी एक अलग शिर्क है।" रिसाले में इसका मेल: "हमे ओस्त नहीं, हमे अज़ ओस्त" (सब कुछ वही नहीं, सब कुछ उसी से है; मक्तूबात, अठारहवाँ मक्तूब)।
📖 1975 → आज · क़िदम, वुजूद, बक़ा
ख़तीब 1975 में सूरजों के एक दिन बुझ जाने की बात ऊष्मागतिकी के नियम से बयान करते हैं। आज का ब्रह्मांड-विज्ञान कायनात की उम्र लगभग 13.8 अरब साल बताता है; यानी कायनात की एक शुरुआत है। दलील का सार (माद्दा अज़ली नहीं है) आज के ज्ञान से भी क़ायम है।
IV — आज का दर्स: इरादा और इल्म
हर चीज़ उसकी तस्बीह करती है
आज का दर्स अल्लाह की इरादे की सिफ़त पर है; इरादे की सिफ़त के मातहत दर्जे में इल्म की सिफ़त भी उसके साथ आती है। होजाएफ़ेंदी पिछले हफ़्तों में पढ़ी गई सूरह अन-नूर की 35वीं आयत याद दिलाते हैं (सुआत यिल्दिरिम का अनुवाद: "अल्लाह आसमानों और ज़मीन का नूर है...") और पूछते हैं: इरादे की सिफ़त की रोशनी में इलाही वुजूद को हम कैसे देखेंगे?
जवाब सूरह अल-इसरा देती है (सुआत यिल्दिरिम का अनुवाद): "कोई चीज़ नहीं जो हम्द के साथ उसे पाक न कहे। मगर तुम उनकी इस तस्बीह और तक़दीस को ठीक से समझ नहीं पाते" (अल-इसरा 17:44)। तस्बीह करने का मतलब क्या है? हर चीज़ अपनी ख़ास ज़बान में कहती है कि कायनात में अल्लाह के सिवा कोई ख़ालिक़ नहीं। और "समझ नहीं पाते" की बात उनके लिए है जो सोचने से भागते हैं, अक़्ल से काम लेने से भागते हैं; जो मसले के अंदर उतर कर इल्म के रास्ते गहराई तक पहुँचता है, उसके लिए यह समझ में आने वाली बात है।
📖 तीन शब्द
| तस्बीह | यह कहना कि अल्लाह के सिवा कोई ख़ालिक़ नहीं, उसका कोई जोड़ और शरीक नहीं। |
| समझ नहीं पाते | बिना सोचे, बिना जाने जीने वालों के लिए; इल्म से देखने वाला समझ लेता है। |
| इरादा और इल्म | हर चीज़ अल्लाह के इरादे से हुई है; इरादा इल्म को चाहता है। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · आज का दर्स: इरादा और इल्म
अल-इसरा 17:44 रिसाला-ए-नूर में इसी मक़सद से आती है: "हर चीज़ अपनी ख़ास ज़बान में अपने ख़ालिक़ को याद करती है" (सोज़लर, तैंतीसवाँ सोज़, तेरहवीं खिड़की)। मक्तूबात का यिल्दिज़नामे (सितारों की नज़्म) भी यही आवाज़ देता है: "हमारी मुहर एक, हमारा तुग़रा एक, हम अपने रब की तस्बीह करने वाले हैं"; ख़तीब भी 21:37 पर "मुहर और तुग़रा" कहते हैं।
V — दुरूद के साथ तफ़क्कुर
एक तश्बीह
होजाएफ़ेंदी सुनने वालों के सामने एक तश्बीह रखते हैं: "मैं आपसे कहूँ कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) एक हदीस-ए-शरीफ़ में फ़रमाते हैं: 'जुमे के दिन दस बार दुरूद-ओ-सलाम पढ़ो तो फ़रिश्ते तुम पर हज़ार बार दुरूद-ओ-सलाम पढ़ते हैं।' यह आपके लिए सवाब का एक दरवाज़ा खोलना, रसूल-ए-अकरम की तरफ़ आपकी नज़रें मोड़ना, अल्लाह की रज़ा की राह में आपको उकसाना है। मगर यही बात एक अलग अंदाज़ में भी कहूँ, तो आपको उसी यक़ीन से उस मसले पर झुकना चाहिए। अल्लाह की किसी आयत पर कायनात में ग़ौर करें, उस आयत से एक किरन, एक मानी लें, मधुमक्खी की तरह अपने दिल में बसा लें, तो अल्लाह उस तफ़क्कुर पर आपके लिए हज़ार नेकियाँ लिखेगा—यह कहूँ..."
दूसरा नुक्ता: अल्लाह की बनाई कायनात से किरन-किरन हासिल होने वाली जानकारी, मानो दीन की रूह के लिए पराई हो, लंबी सदियों तक मस्जिद और जमाअत से दूर रखी गई। "इसे हमारी बे-इरफ़ानी का नतीजा समझना चाहिए।" होजाएफ़ेंदी के मुताबिक़ "इल्म-ओ-फ़न, आधुनिक विज्ञान को मस्जिद में लाओगे"। और वे आगे कहते हैं: "दिल और दिमाग़ का निकाह कराओगे। जिस दिन से दिल ने दिमाग़ को तीन तलाक़ दे कर छोड़ा, जिस दिन से दिल दिमाग़ से जुदा हुआ, तब से मोमिन औंधे मुँह घिसट रहे हैं। मोमिन का फिर से सीधा हो कर खड़ा होना इस दिल और दिमाग़ के निकाह पर टिका है। दिल और दिमाग़ का ब्याह होगा तो उससे इलाही मारिफ़त जन्म लेगी और मोमिनों के चेहरे खिलेंगे।"
📖 दिल और दिमाग़
| दिल | ईमान, मारिफ़त, मुहब्बत। |
| दिमाग़ | इल्म की शाखाएँ; कायनात से ली गई जानकारी। |
| निकाह | दोनों का निकाह हो तो इलाही मारिफ़त जन्म लेती है; मोमिन का फिर से सीधा हो कर खड़ा होना इसी पर टिका है। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · दुरूद के साथ तफ़क्कुर
दिल और दिमाग़ का निकाह बदीउज़्ज़माँ के मुनाज़रात का वाक्य है: "ज़मीर की रोशनी दीनी उलूम हैं। अक़्ल का नूर आधुनिक विज्ञान हैं। दोनों के मेल से हक़ीक़त प्रकट होती है।" स्रोत टिप्पणी: ख़तीब की बताई दुरूद वाली हदीस इन शब्दों में (जुमे के दिन दस → फ़रिश्ते हज़ार) हदीस के स्रोतों में नहीं मिली। सबसे क़रीबी रिवायतें: मुस्लिम (सलात 408) "जो मुझ पर एक दुरूद भेजे, अल्लाह उस पर दस रहमतें भेजता है"; तबरानी (अजलूनी, कश्फ़ुल-ख़फ़ा 1/189) "जुमे के दिन मुझ पर ख़ूब दुरूद भेजो... जो एक दुरूद भेजे, मैं और मेरे फ़रिश्ते उस पर दस दुरूद भेजते हैं"; अहमद बिन हंबल "अल्लाह और उसके फ़रिश्ते सत्तर रहमतें भेजते हैं"। ख़तीब ने इन रिवायतों को आम लोगों की समझ में आने वाली एक तश्बीह में जोड़ा है; सार रिवायतों से मेल खाता है।
VI — कायनात के लिए तीन संभावनाएँ
इत्तिफ़ाक़ यहाँ हो सकता है, यहाँ नहीं
कायनात की मौजूदगी हम आँख से, दूरबीन से, सूक्ष्मदर्शी से देखते हैं। उसे या तो अल्लाह ने पैदा किया है, या परमाणुओं ने सिर जोड़ कर आपस में तय कर लिया है, या वह संयोग से हुई है। होजाएफ़ेंदी दूसरी सूरत को "भ्रामक तर्क" कह कर एक तरफ़ रखते हैं और तीसरी का विश्लेषण करते हैं: इत्तिफ़ाक़ को हम कभी मुमकिन मानते हैं; मगर कुछ हालतें ऐसी होती हैं कि वहाँ इत्तिफ़ाक़ को मुमकिन मानना, उस पर एक साथ दस तरह की सिफ़तें लाद देना है। निज़ाम और तरतीब, वुजूद को भी दिखाती है और इरादे को भी।
"आपके सामने इत्तिफ़ाक़ के मुमकिन और मुहाल होने की कुछ मिसालें रखता हूँ।" वाज़ की रीढ़ इसके बाद आने वाली मिसालें हैं।
📖 तीन सूरतें
| अल्लाह ने पैदा किया | मोमिनों का अक़ीदा। |
| परमाणुओं ने तय किया | भ्रामक तर्क; बे-शऊर परमाणुओं को शऊर देना। |
| संयोग | विश्लेषण करें तो उसके नीचे से इरादा निकलता है। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · कायनात के लिए तीन संभावनाएँ
यही तिकड़ी तबीअत रिसाले (लेमालर (The Flashes), तेईसवाँ लेमा) के रास्ते हैं: "सबब पैदा करते हैं", "अपने आप बन जाती है", "प्रकृति ऐसा चाहती है"—इन मुहाल बातों के सामने एकमात्र रास्ता क़ादिर-ए-ज़ुल-जलाल का पैदा करना है। "कोई चीज़ अपने आप हरकत नहीं करती" वाक्य की जगह तीसवाँ सोज़, दूसरा मक़सद, पहला नुक्ता है।
VII — मस्जिद और एक के ऊपर एक रहलें
अंक जितने बढ़ें, इत्तिफ़ाक़ उतना घटे
मस्जिद में जा कर एक के ऊपर एक रखी तीन रहलें देखें: नीचे नंबर एक, उसके ऊपर दो, उसके ऊपर तीन। पास में हाथ-पाँव बँधा, आँखों से न देखने वाला एक बेबस बच्चा। हम दो लोग बहस छेड़ दें: इन रहलों को क्रम से इस बच्चे ने रखा, या यह संयोग है? तीन रहलों के लिए एक संभावना मानी जा सकती है। मगर रहलें जितनी बढ़ें, इत्तिफ़ाक़ उसी अनुपात में घटता है: छह रहलें, दस रहलें, सौ रहलें... "कहते हैं, इत्तिफ़ाक़ गणित में अंकों के बढ़ने के विलोम अनुपात में होता है। पुराने लोग इसे 'मअकूसन मुतनासिब' कहते थे।"
और ख़ुद मस्जिद? एक हवा संगमरमर ले आए, दूसरी उन्हें एक के ऊपर एक रख दे, तीसरी गुंबद में पत्थरों को सिर से सिर मिला दे, एक और ख़ुरासानी गारा डाल कर लोहे के बंधनों से जोड़ दे... क्या लगातार संयोगों से मस्जिद बन सकती है? होजाएफ़ेंदी बीच में एक बात कह देते हैं: "मैं इनमें से किसी को इत्तिफ़ाक़ नहीं कहता। यहाँ रखी एक रहल, एक अकेली रहल की मौजूदगी को भी इत्तिफ़ाक़ नहीं कहता। क्योंकि उसे भी किसी इरादे वाले ने रखा है।"
📖 रहलों की गिनती और इत्तिफ़ाक़ का हिस्सा
| 3 रहलें | एक संभावना मान सकते हैं। |
| 6, 10 रहलें | इत्तिफ़ाक़ कुछ और घट जाता है। |
| 100 रहलें | इत्तिफ़ाक़ का कोई हक़ नहीं बचता; यूँ ही फेंकी रहलें इस हालत में खड़ी नहीं हो सकतीं। |
VIII — गाड़ी और पगड़ी
कड़ियाँ बढ़ें तो इत्तिफ़ाक़ अपना हक़ खो देता है
होजाएफ़ेंदी उस दिन अपने साथ हुई बात को मिसाल बनाते हैं: "अपना जुब्बा मैंने ख़ुद हाथ में लिया, पगड़ी के साथ ले गया। और शाम को तय किया, उन्हें नायलॉन के थैले में रखा। लाऊँगा कह कर अपने पास रखा। काम इत्तिफ़ाक़ के हवाले हुआ, तो आधा रास्ता तय करने पर समझा कि मैं उन्हें वहीं भूल आया हूँ। तो आज बिना पगड़ी वाज़ करने का मतलब और माजरा बस यही है।" सड़क पर चलते हुए पीछे से कोई गाड़ी टक्कर मार दे, इसे भी एक संभावना के तौर पर इत्तिफ़ाक़ कहा जा सकता है। मगर टक्कर से पहले दूसरी गाड़ी का रुकने की कोशिश करना, दोनों गाड़ियों का भिड़ जाना, ठीक उसी पल ऊपर से एक उल्का का गाड़ी के सामने आ गिरना, गाड़ी पकड़ न पाने वाले एक मुसाफ़िर का पीछे रह जाना, ड्राइवर का उस दिन किसी को गाली दे कर गाड़ी में बैठना... कड़ियाँ बढ़ें तो इत्तिफ़ाक़ अपना हक़ खो देता है; "सबसे ज़िद्दी भी मानेगा कि" इन्हें इत्तिफ़ाक़ पर नहीं डाला जा सकता।
"सिर्फ़ एक घटना, एक शऊर वाले इंसान के यहाँ इत्तिफ़ाक़ पर छोड़ दी जाए तो ऐसे ख़ला, ऐसी दरारें पैदा होती हैं। फिर ये घटनाएँ एक-दूसरे से जुड़ी कई हों, तो इत्तिफ़ाक़ को संभव मानना पागलपन और जुर्म का काम होगा।"
📖 ज़ंजीर
| 1 कड़ी | पीछे से एक गाड़ी टकराती है: इत्तिफ़ाक़ कह सकते हैं। |
| 3 कड़ियाँ | टक्कर, उल्का, पीछे रह गया मुसाफ़िर: इत्तिफ़ाक़ दूर होता जाता है। |
| 5 कड़ियाँ | ड्राइवर की उस दिन की हालत भी जुड़ जाए तो इत्तिफ़ाक़ की कोई जगह नहीं बचती। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · गाड़ी और पगड़ी
रिसाला-ए-नूर में इत्तिफ़ाक़ इसी पैमाने से रद्द होता है: "हर चीज़ में, चाहे वह कितनी ही छोटी हो, एक इरादे और मक़सद की झलक मौजूद है; इत्तिफ़ाक़ हक़ीक़त में होता ही नहीं" (कस्तमोनू लाहिक़ा)। गाड़ी की मिसाल का क्लासिकी आधार इब्न सीना में भी है: जो हमेशा या ज़्यादातर होता है, उसे लोग इत्तिफ़ाक़ नहीं कहते।
IX — छापाख़ाना और संभावना का हिसाब
पाँच लाख अक्षर, एक क़सीदा
एक छापाख़ाना सोचिए: पाँच लाख लोहे के अक्षर। कंपोज़ करने वाले अक्षर उठाते हैं, सजाते हैं; किताबें छपती हैं। अब इस छापाख़ाने में एक हवा घुसे, अक्षरों को उलट दे। हवा से उलटे अक्षरों से एक शब्द बन सकता है, एक संभावना है। दस शब्द, दस वाक्य? "फिर भी हो सकता है। यह साफ़ मुहाल नहीं है।" मगर: "तीसरा आदमी आ कर आपसे कहे: ये पाँच लाख अक्षर उलटे। एक भी अक्षर ज़ाया हुए बिना सबने शब्दों से एक मौज़ूँ क़सीदा बना दिया। ऐसा क़सीदा कि काबा की दीवार पर टाँगे गए लबीद और इमरउल-क़ैस के क़सीदे उसके सामने बहुत फीके पड़ जाएँ... कोई यह कहे तो आप कहेंगे: पहले वालों को अपनी इंसाफ़पसंदी से संभव मान भी लूँ, मगर इसे क़बूल नहीं करता, क्योंकि यह असल में सारे भ्रामक तर्कों को क़बूल करने के बराबर होगा; आप उसे रद्द कर देंगे।"
होजाएफ़ेंदी संभावना का हिसाब भी बताते हैं: दस अंकों से एक इमारत बनाना, नंबरों को क्रम से सजाना, इत्तिफ़ाक़ के हिसाब से दस अरब में एक संभावना है। बाईस पत्थरों से, हज़ार अरब गुना हज़ार अरब में एक। कुर्सी, गद्दी, पगड़ी, इंसान: हर एक अलग इरादा चाहता है। "इन सब को इत्तिफ़ाक़ पर डालना विज्ञान से टकराना है।"
📖 चार सीढ़ियाँ
| एक शब्द | हवा से हो सकता है; संभावना मानी जाती है। |
| दस वाक्य | फिर भी हो सकता है; साफ़ मुहाल नहीं। |
| एक क़सीदा | क़बूल नहीं; यह सारे भ्रामक तर्कों को क़बूल करना है। |
| 22 पत्थर | हज़ार अरब गुना हज़ार अरब में एक संभावना। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · छापाख़ाना और संभावना का हिसाब
तबीअत रिसाले में यही मिसाल है: "छापाख़ाने में अक्षरों की गिनती के बराबर लोहे के अक्षर होते हैं, फिर वे अक्षर वुजूद पाते हैं"; दवाख़ाने की मिसाल में शीशियों के "तूफ़ानी हवा के झोंके से उलट जाने" से दवाओं के अपने आप न बन सकने की बात बताई गई है (लेमालर, तेईसवाँ लेमा)। दसवें सोज़ में भी कहा गया है: "जिसके हर अक्षर के अंदर एक सुव्यवस्थित क़सीदा लिखा हो, उसका बिना लिखने वाले के होना हद दर्जे मुहाल है।" काबा की दीवार पर टँगे लबीद के क़सीदे का ज़िक्र पच्चीसवें सोज़ में है।
X — कोशिका, प्रोटीन, परमाणु
एक प्रोटीन में चालीस हज़ार परमाणु
कोशिका को तुर्की में "हुजरा" (hücre) कहते हैं, और अरबी में इसका मतलब कमरा है; यह इंसान का सबसे छोटा हिस्सा है। कोशिका की बुनियादी बनावट प्रोटीन है; छह-सात तत्व हमारे छोटे कमरों को बनाते हैं, प्रोटीन की लड़ियाँ तैयार करते हैं। "अल्लाह जल्ल जलालुहू ने तस्बीह के दानों की तरह एक-दूसरे में पिरोई प्रोटीन की लड़ियों से ये कोशिकाएँ बनाई हैं।" 1975 में होजाएफ़ेंदी का दिया आँकड़ा: प्रोटीन के एक अकेले टुकड़े में चालीस हज़ार परमाणु होते हैं; परमाणु इतने छोटे हैं कि एक करोड़ एक कतार में रखें तो एक मिलीमीटर बनता है।
ये चालीस हज़ार परमाणु इकट्ठे होंगे, आपस में सहमत होंगे, ऐसी सूरत लेंगे कि तुम्हारे बदन का एक छोटा टुकड़ा, प्रोटीन का एक टुकड़ा बन जाएगा। "इसका मतलब क्या?"—इस सवाल का जवाब अगली मिसाल में है।
📖 छोटे से बड़े तक
| परमाणु | एक करोड़ एक कतार में = एक मिलीमीटर। |
| प्रोटीन | चालीस हज़ार परमाणु; तस्बीह के दानों की तरह पिरोए जाते हैं। |
| कोशिका | इंसान का कमरा; प्रोटीन की लड़ियों से बुना जाता है। |
| इंसान | कमरों का एक साथ जुड़ना। |
📖 1975 → आज · कोशिका, प्रोटीन, परमाणु
ख़तीब का "एक प्रोटीन में चालीस हज़ार परमाणु" वाला आँकड़ा 1958 के एक लेख (Frank Allen, The Evidence of God in an Expanding Universe) से आता है। आज के माप के अनुसार एक औसत प्रोटीन में 7-9 हज़ार परमाणु होते हैं; बड़े प्रोटीनों में दसियों हज़ार। एक मिलीमीटर में एक कतार में 20 लाख से 1 करोड़ परमाणु समाते हैं। मिसाल का सबक़ (चालीस हज़ार हिस्सों का आपस में तालमेल) आज के ज्ञान से भी क़ायम है।
XI — चालीस हज़ार की फ़ौज
शऊर वाली फ़ौज का यह हाल, तो बे-शऊर परमाणुओं का?
चालीस हज़ार की एक फ़ौज सोचिए; उसका एक कमांडर है, हुक्म देता है: हर कोई मुझे ख़ुश करने वाली वर्दी पहनेगा, वैसा हथियार कसेगा, अपनी टुकड़ी, अपनी बटालियन में जगह लेगा। मगर हुक्म कुछ उलझे हैं। चालीस हज़ार लोग इकट्ठे हों तो आप देखेंगे: किसी के सिर पर हरा बँधा है, किसी के पास लाल, भड़कीली कोई चीज़; किसी ने घर की रोटी की छुरी कमर में खोंस ली है, कोई माउज़र ले कर आया है। गड्ड-मड्ड, खिचड़ी फ़ौज। क्यों? क्योंकि किसी को किसी की ख़बर नहीं।
शऊर वाले इंसानों का चालीस हज़ार की फ़ौज बनाना ऐसी पहेली हो, तो चालीस हज़ार बे-शऊर परमाणुओं का इकट्ठे हो कर प्रोटीन का एक टुकड़ा बन जाना कैसे माना जाए? "...अक़्ल से दूर है कि फ़ौज के मुकम्मल इकट्ठे होने को संभव न मानने वाले इंसान को चालीस हज़ार परमाणुओं के इकट्ठे हो कर ऐसा प्रोटीन बनाने को संभव नहीं मानना चाहिए।"
📖 दो कॉलम
| 40,000 सिपाही | शऊर वाले; फिर भी कमांडर के बिना इकट्ठे नहीं हो सकते। |
| 40,000 परमाणु | बे-शऊर; फिर भी एक प्रोटीन बना देते हैं। |
| नतीजा | यह करने वाला परमाणु नहीं, परमाणु के कान में फुसफुसाने वाला है। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · चालीस हज़ार की फ़ौज
सिपाही की तश्बीह तीसवें सोज़ के दूसरे मक़सद में है: "जिस तरह एक सिपाही का अपनी टुकड़ी, कंपनी, बटालियन, रेजिमेंट और डिवीज़न में एक-एक रिश्ता और उस रिश्ते के मुताबिक़ एक-एक ज़िम्मेदारी होती है...", उसी तरह ज़र्रा भी हर दायरे में अपनी ज़िम्मेदारी जानता है। बिना सरदार की बटालियन की गड़बड़ी तीसवें लेमा (इस्म-ए-फ़र्द) और बीसवें मक्तूब में, और ज़र्रों का "एक फ़रमाँबरदार फ़ौज के सिपाहियों की तरह" होना तीसवें लेमा में बयान हुआ है।
XII — एक प्रोटीन की संभावना
10 की घात 160 में एक
"इसी नज़रिए से स्विस मशहूर रियाज़ीदाँ, यानी गणितज्ञ चार्ल्स कहता है: एक अकेले प्रोटीन का—ध्यान दीजिए—हमारे चाहे तरीक़े से, इस एक अकेले प्रोटीन का, लड़ी का नहीं, बन जाना, यानी इन चालीस हज़ार परमाणुओं का एक शोरबा बनना, कोशिका में एक खाना बनना, संभावना के हिसाब से 10 की घात 160 से गुणा... संभावनाओं में से एक संभावना से हो सकता है। 10 की घात 160, पढ़ा नहीं जाता यह अंक। धरती की रेत को शून्य बनाइए, आगे एक अंक रखिए, यह अंक उसके सामने छोटा रह जाएगा।" लेकॉम्त दु नूई आगे कहता है: "इंसान सिर्फ़ एक प्रोटीन नहीं है। ढेरों प्रोटीन तस्बीह के दानों की तरह इकट्ठे होते हैं" और कोशिका बनाते हैं। एक प्रोटीन की लड़ी बनने के लिए 10 की घात 243 में एक संभावना।
होजाएफ़ेंदी के मुताबिक़ इत्तिफ़ाक़, संयोग कहते वक़्त मसले को यूँ समझना चाहिए। इंसान एक प्रोटीन की लड़ी भी नहीं है; कोशिका के दूसरे तत्वों, उसके RNA, DNA, साइटोप्लाज़्म को लिया जाए तो मसला और उलझ जाता है।
📖 दो अंक
| एक प्रोटीन | 1 / 10^160 (गुये का हिसाब, ख़तीब की नक़्ल)। |
| प्रोटीन की लड़ी | 1 / 10^243 (लेकॉम्त दु नूई, ख़तीब की नक़्ल)। |
| सबक़ | इसे इत्तिफ़ाक़ पर डालना, विज्ञान के अपने अंकों से टकराना है। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · एक प्रोटीन की संभावना
ये अंक रिसाला-ए-नूर में नहीं आते; मगर फ़ैसला वही है: ज़र्रों का "अपने आप" इकट्ठा होना "हज़ारों गुना मुहाल है", और ऐसा मानें तो हर ज़र्रे को "कायनात के सानेअ (बनाने वाले) की सिफ़तों जितनी कमाल की सिफ़तें" देनी पड़ेंगी (तीसवाँ सोज़, दूसरा मक़सद, तीसरा नुक्ता)।
📖 1975 → आज · एक प्रोटीन की संभावना
होजाएफ़ेंदी का नक़्ल किया हिसाब शार्ल-यूजीन गुये (Charles-Eugène Guye; 1866-1942, जिनेवा के भौतिकविद्) का है; Frank Allen के 1958 के लेख में उन्हें "स्विस गणितज्ञ" कहा गया है, और 40,000 परमाणु तथा 10^160 के अंक वहीं से हैं। गुलेन की अपनी किताब (Yaratılış Gerçeği ve Evrim) में भी यही नक़्ल है। आज जैव-रसायन एक ही क़दम में बेतरतीब सजने वाला मॉडल इस्तेमाल नहीं करता; काम करने वाले प्रोटीन की तह (फ़ोल्डिंग) के अनुमान दूसरे तरीक़ों से निकाले जाते हैं (जैसे 10^77 में एक)। किसी भी मॉडल से हिसाब लगाएँ, संभावना अक़्ल से परे हद तक छोटी है; सबक़ का सार क़ायम है। लेकॉम्त दु नूई का 10^243 का अंक Human Destiny (1947) में गुये के हिसाब पर आधारित है।
XIII — ज़र्रा दो पहलुओं से दलालत करता है
एक ज़र्रा, हज़ार काम
"पुराने लोग ज़र्रा कहते थे; ज़र्रा अरबी में परमाणु को कहते हैं।" ज़र्रा वाजिबुल-वुजूद पर दो पहलुओं से दलालत करता है। पहला: बे-शऊर परमाणु का उस पर लादे गए भारी काम आसानी से कर देना; चालीस हज़ार का सहमत हो कर प्रोटीन का एक टुकड़ा बना देना ज़र्रे की ताक़त, क़ुव्वत, इल्म, क़ुदरत पर डाली जाने वाली चीज़ नहीं। दूसरा: हर ज़र्रे का कायनात की सारी घटनाओं से रिश्ता है। हवा का एक ज़र्रा टेलीविज़न की तस्वीर पहुँचाए तो दूसरे ज़र्रों से तालमेल करेगा; वायरलेस की आवाज़ ढोएगा; फूल के अंदर जाने के काम पर जाएगा; आपकी आवाज़ पहुँचाने वाला एक रुक्न बनेगा। एक ज़र्रा "सौ काम एक साथ करेगा"।
जबकि हम ज़र्रे में न ताक़त सोचते हैं, न क़ुव्वत, न इल्म। "ज़र्रे को ये काम देने का मतलब अल्लाह की सिफ़तें देना है। ला यश्ग़लुहू शअ्नुन अन शअ्निन" (एक काम उसे दूसरे काम से नहीं रोकता)। यूँ ज़र्रा दो पहलुओं से अल्लाह पर दलालत करता है और हर चीज़ उसकी तस्बीह करती है; "मगर आप मेरी पेश की ये बातें नहीं जानते, इसलिए ज़र्रा अल्लाह की तस्बीह कैसे करता है, नहीं जान पाते।"
📖 दो पहलू
| पहला पहलू | बे-शऊर ज़र्रा भारी काम कर रहा है; यह उसकी अपनी ताक़त से नहीं हो सकता। |
| दूसरा पहलू | एक ज़र्रा एक ही वक़्त में सौ कामों में; यह हर चीज़ जानने और इरादा करने वाले किसी को दिखाता है। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · ज़र्रा दो पहलुओं से दलालत करता है
वाज़ का यह हिस्सा शुरू से आख़िर तक सोज़लर, तीसवाँ सोज़, दूसरा मक़सद के साथ चलता है। दूसरे नुक्ते में: "हर ज़र्रे में वाजिबुल-वुजूद के वुजूद और वहदत के दो सच्चे गवाह हैं। हाँ, ज़र्रा अपनी बेबसी और जड़ता के बावजूद शऊर भरे अंदाज़ में बड़े काम करके, भारी बोझ उठा कर जिस तरह वाजिबुल-वुजूद के वुजूद की पक्की गवाही देता है, उसी तरह अपनी हरकतों में आम निज़ामों के मुताबिक़ चल कर... वाजिबुल-वुजूद की वहदत की गवाही देता है।" हवा के ज़र्रे का टेलीफ़ोन, टेलीग्राफ़ और रेडियो के काम एक साथ करना तेरहवें सोज़ के ज़ैल (परिशिष्ट) के हुवा नुक्ते में; "एक चीज़ दूसरी चीज़ में रुकावट नहीं बनती" बीसवें मक्तूब में आता है।
📖 1975 → आज · ज़र्रा दो पहलुओं से दलालत करता है
ख़तीब यहाँ "एक करोड़ परमाणु एक मिलीमीटर" और "चालीस हज़ार परमाणु" जैसे 1975 के आँकड़े फिर इस्तेमाल करते हैं; आज की क़ीमतें खंड X की टिप्पणी में हैं। ज़र्रे के एक ही वक़्त में कई काम करने का बयान (हवा का आवाज़, रोशनी और ख़ुशबू ढोना) आज की भौतिकी से भी मेल खाता है।
XIV — अंधा आदमी: फ़ैक्ट्री और झोंपड़ी
"इस अंधे को यहाँ काम पर लगाने वाला कोई है"
पहले पेश की गई मिसाल में एक नाबीना के रहलों को एक के ऊपर एक जमा देने को शायद एक संभावना दी जा सके। मगर कायनात का मसला पूरी तरह उलझा हुआ है: "कायनात के आम मसलों पर आएँ तो एक घटना को भी अल्लाह को दिए बिना उस घटना को समझाने की कोई गुंजाइश, कोई संभावना नहीं।" होजाएफ़ेंदी एक अंधे, अपाहिज आदमी को फ़ोर्ड की फ़ैक्ट्रियों में काम करते दिखाते हैं; फिर कहते हैं कि परमाणु उससे भी ज़्यादा अंधा, उससे भी ज़्यादा अपाहिज है: पत्थर, मिट्टी, लोहे का ढेर। मगर परमाणु ये शऊर वाले काम कर रहा है; तो "ज़र्रे के कान में फुसफुसाने वाला, अपने क़ानून से, अपने निज़ाम से फुसफुसाने वाला कोई है। वह अल्लाह है, जल्ल जलालुहू। तो ज़र्रा घूमते दरवेश की तरह अपनी हरकत से, अल्लाह ने उसके कान में जो फुसफुसाया, उसकी तिलावत कर रहा है।"
फिर झोंपड़ी की मिसाल: "आँखों से न देखने वाला, नाकारा, अपाहिज एक आदमी अपनी छोटी सी झोंपड़ी में बैठा है। उस झोंपड़ी के अंदर एक टुकड़ा पत्थर फेंका जाता है, एक टुकड़ा हड्डी फेंकी जाती है, थोड़ी रुई फेंकी जाती है। फिर आप देखते हैं, झोंपड़ी के दूसरी तरफ़ से चीनी निकलती है, जवाहर निकलते हैं, मलमल निकलती है, कपड़े निकलते हैं। क्या आपको कोई शक रह जाता है कि ये काम यह आदमी नहीं कर रहा? ... बल्कि कहेंगे कि इस अंधे को यहाँ काम पर लगाने वाला कोई है।" यहाँ होजाएफ़ेंदी बदीउज़्ज़माँ की बात मफ़हूम के तौर पर नक़्ल करते हैं: "तेरे ऊपर गुज़रने वाली ढेरों शऊर वाली घटनाएँ, शऊर के साथ होने वाली वे घटनाएँ, ख़ुद शऊर वाली नहीं, इसलिए दिखाती हैं कि उनके पीछे एक शऊर वाला है, और ये उस शऊर वाले की सनअत हैं।"
📖 झोंपड़ी
| अंदर जाने वाला | पत्थर, हड्डी, रुई। |
| बाहर निकलने वाला | चीनी, जवाहर, मलमल, कपड़ा। |
| फ़ैसला | इन्हें जानने वाला, इरादा करने वाला, इंतिज़ाम करने वाला कोई है: वह अल्लाह है। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · अंधा आदमी: फ़ैक्ट्री और झोंपड़ी
झोंपड़ी की मिसाल बदीउज़्ज़माँ की है: "और जैसे एक अंधा, बेबस, अपनी जगह से उठ न सकने वाला आदमी एक सादी-सी छोटी झोंपड़ी में बैठा हो। उस झोंपड़ी में एक दिरहम जितना छोटा पत्थर, हड्डी और रुई जैसी चीज़ें दी जाती हैं। फिर उसी झोंपड़ी से मनों चीनी, थानों के थान कपड़ा, हज़ारों जवाहरात... निकलते आएँ, तो क्या ज़र्रा भर अक़्ल रखने वाला भी यह न कहेगा कि 'यह आदमी किसी निहायत करिश्मासाज़ हस्ती की, उसके करिश्मों के स्रोत, फ़ैक्ट्री का एक पुर्ज़ा है, या एक बेचारा दरबान'?" अंधे आदमी का यूरोप की फ़ैक्ट्रियों में काम करना और "घूमते दरवेश की तरह ज़िक्र करते और चक्कर में उठते ज़र्रे" भी उसी जगह हैं (सोज़लर, तीसवाँ सोज़, दूसरा मक़सद, पहला नुक्ता)।
XV — वही परमाणु, अलग साँचे
मीज़ान
हमारे मुँह से परमाणु अंदर जाते हैं: रोटी के टुकड़े, पत्थर, लोहा, ताँबा, चूना। कोशिकाओं तक पहुँच कर ये अपने हिसाब से सूरत लेते हैं, फ़ायदेमंद चीज़ें बन जाते हैं। "कायनात में हक़ तआला हर चीज़ उन्हीं परमाणुओं से बनाता है": हाइड्रोजन से यूरेनियम तक जितने परमाणु हैं, कायनात उन्हीं से बनी है; "हालाँकि ध्यान दीजिए। हर चीज़ की शक्ल अलग है, माहियत अलग है, बनावट अलग है। यानी हर चीज़ अलग साँचा माँगती है।"
होजाएफ़ेंदी सूरह अर-रहमान पढ़ते हैं; सुआत यिल्दिरिम के अनुवाद से: "उसने आसमान को यूँ ऊँचा किया और यह मीज़ान रखी, ताकि तुम भी सबक़ लेकर हद से न बढ़ो। तो तुम भी तौल इंसाफ़ से करो, ख़बरदार तराज़ू को, संतुलन को न बिगाड़ो!" (अर-रहमान 55:7-9)। ख़तीब के शब्दों में: "अल्लाह ने आसमान और ज़मीन में एक मीज़ान रखी है। आपको इस मीज़ान के तहत बनाई कायनात में घुमाता, फिराता है।" प्रोटीन का बारीक हिसाब भी इसी पर टिका है: एक नाप से जो फ़ायदेमंद है, दूसरे नाप से नुक़सानदेह है; सोडियम और क्लोरीन से नमक बनता है, दूसरी तरह का यौगिक ज़हर हो सकता है। "यूँ हर चीज़ मीज़ान से बनाने वाले अल्लाह के मीज़ान के सामने, ख़बरदार! आप बेलगाम की तरह हरकत न करें, बे-निज़ाम हरकत न करें।"
📖 मीज़ान
| आसमान में | कक्षाएँ, सूरज, मंडल नाप से चलते हैं। |
| कोशिका में | अरब में एक की ज़्यादती या कमी ज़हर बन जाती है। |
| इंसान में | हद से न बढ़ो, तौल इंसाफ़ से करो। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · वही परमाणु, अलग साँचे
मीज़ान के बयान की रिसाले में जगह तीसवें लेमा का दूसरा नुक्ता (इस्म-ए-अद्ल) है: अर-रहमान 55:7 के साथ "चार बार मीज़ान" पर ज़ोर; कोशिका के "बारीक और नाज़ुक संतुलन"; और यह चेतावनी: "ऐ फ़िज़ूलख़र्च, किफ़ायत न करने वाले... ऐ बे-मीज़ान इंसान!" एक ही परमाणुओं का अलग-अलग साँचों में ढलना तबीअत रिसाले में "बीजों... का माद्दा एक है" और "स्रोत और कारख़ाना" के बयानों से समझाया गया है।
XVI — धरती का संतुलन
धरती की परत, सूरज, ऑक्सीजन, धुरी, चाँद
होजाएफ़ेंदी क्रम से गिनाते हैं: धरती के गोले की परत कुछ फ़ुट और मोटी होती तो ऑक्सीजन को निगल जाती, ज़िंदगी न होती। सूरज कभी 14 करोड़ 95 लाख से 15 करोड़, कभी 13 करोड़ 50 लाख किलोमीटर दूर है; दूरी ज़रा घटे या बढ़े तो धरती पर ज़िंदगी न हो; बीस हज़ार मील पास आ जाए तो जल जाएँ, उतनी दूर हो जाए तो जम जाएँ। हवा का इक्कीस प्रतिशत ऑक्सीजन है; पचास प्रतिशत होती तो हर चिंगारी आग बन जाती। धरती की धुरी साढ़े तेईस डिग्री झुकी है; सीधी होती तो बादल ध्रुवों पर जमा हो जाते, बारिश सिर्फ़ उत्तर और दक्षिण में होती।
वायुमंडल ज़रा और उथला होता तो उल्काएँ, जैसे चाँद से टकराती हैं, वैसे धरती से टकरातीं; ज़रा और घना होता तो सूरज की फ़ायदेमंद किरणें न आतीं। सूरज को एक राह पर चलाने वाला अल्लाह धरती को भी चलाता है; कक्षा से ज़रा सा भटकना हर चीज़ को अंतरिक्ष में फेंक देगा। चाँद से वहाँ कैलेंडर का काम कराने वाला अल्लाह है। ज़मीन को एक दस्तरख़्वान की तरह तैयार करने वाला वही है; धरती अगर बुध की तरह एक चेहरा हमेशा सूरज की तरफ़ किए घूमती, तो उस तरफ़ सब कुछ धू-धू कर जल जाता, इस तरफ़ शायद जम जाता। "धरती के गोले को मौजूदा शक्ल में घुमाने वाला और इसे नेमतों का दस्तरख़्वान बनाने वाला, हर बहार में तरह-तरह की नेमतों से सजाने वाला, इंसानों के फ़ायदे के लिए पेश करने वाला अल्लाह है; यह भी संयोग पर नहीं डाला जा सकता।"
📖 एक-दूसरे से जुड़ी शर्तें
| परत | ज़रा मोटी हो तो ऑक्सीजन निगल जाए। |
| सूरज | दूरी घटे तो जल जाएँ, बढ़े तो जम जाएँ। |
| ऑक्सीजन | इक्कीस प्रतिशत; पचास प्रतिशत हो तो आग। |
| धुरी, वायुमंडल, चाँद | झुकाव, घनत्व और कक्षा; सब नाप से। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · धरती का संतुलन
सूरज और ग्रहों का संतुलन, "इसकी रफ़्तार ज़रा भी बढ़ा या घटा दी जाती तो यह अपने रहने वालों को अंतरिक्ष में बिखेर देती", और हवा के ज़हरीली हो जाने की बात तीसवें लेमा के इस्म-ए-अद्ल वाले बयान में है। "चाँद से कैलेंडर का काम कराता है" वाक्य तीसरे मक्तूब में हूबहू आता है। ज़मीन का "नेमतों का दस्तरख़्वान" होना और हर बहार में उसका सजाया जाना दसवें सोज़ में, और इंसान की इज़्ज़त में बिछाया गया दस्तरख़्वान बीसवें सोज़ में है।
XVII — दो दर्स, एक नतीजा
अल्लाह का इरादा न हो तो इनमें से कुछ भी न हो
"पिछले दर्स में जैसे माद्दे के बाद में पैदा किए जाने के पैमाने, कसौटी से अल्लाह के क़िदम और बक़ा को, वुजूद को पेश किया, बयान किया था। इस दर्स में भी अल्लाह के इल्म को, इरादे को, और एक पहलू से हक़ तआला के वुजूद को फिर बयान कर चुके। हाँ, अल्लाह का इरादा न हो तो इनमें से कुछ भी न होगा। यह इल्म कहता है।" इल्म की कही इन बातों के उलट जाने वाली हर चीज़ रद्द होनी चाहिए।
हमारे सामने इन बातों में महारत रखने वाले लोग आएँगे; हमें कोई हिचक न हो: "उनकी कही, मगर जिनसे वे नतीजे तक न पहुँच सके, वे बातें हैं। हम उनकी कही, हमें बताई चीज़ों से नतीजे तक पहुँचते हैं। कहते हैं: 'ये आप ख़ूब नक़्ल करते हैं, मगर संयोगों पर, इत्तिफ़ाक़ों पर नहीं डाले जा सकते। ये अल्लाह की इनायत से, उसके इरादे से हैं।'" वाज़ एक दुआ पर ख़त्म होता है: अल्लाह धोखा खाई, भटकी नस्लों की इस्लाह, इरशाद और हिदायत फ़रमाए; हमें समझ अता करे, इन्हें गुमराह करने वालों को इंसाफ़ और समझ दे। "हक़ीक़त बहुत बड़ी, बहुत अज़ीम है। अल्लाह ख़ुद को साफ़, खुल कर बता रहा है। कुछ भी छिपा नहीं। हर चीज़ अपने ज़ुहूर की शिद्दत से छिपी है; मगर अंधे यह बात देख नहीं पा रहे।"
📖 वाज़ की मिसालें
| मस्जिद और रहलें | अंक जितने बढ़ें, इत्तिफ़ाक़ उतना घटे। |
| गाड़ी और उल्का | कड़ियाँ बढ़ें तो इत्तिफ़ाक़ अपना हक़ खो देता है। |
| छापाख़ाना और क़सीदा | पाँच लाख अक्षरों से क़सीदा: मुहाल। |
| फ़ौज और प्रोटीन | शऊर वाले चालीस हज़ार इकट्ठे नहीं हो पाते, तो बे-शऊर चालीस हज़ार कैसे तालमेल करें? |
| ज़र्रा और झोंपड़ी | बे-शऊर का शऊर वाला काम, पीछे एक शऊर वाले को दिखाता है। |
| मीज़ान और संतुलन | परत, सूरज, ऑक्सीजन, धुरी, चाँद: सब नाप से। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · दो दर्स, एक नतीजा
"अपने ज़ुहूर की शिद्दत से छिपा" रिसाला-ए-नूर का बयान है: "ऐ अपने ज़ुहूर की शिद्दत से छिपे हुए..." (शुआलर (The Rays), तीसरी शुआ, मुनाजात), और मुहाकमात में: "ज़ुहूर की शिद्दत से न दिखने की हद तक पहुँची चीज़ें हैं: सूरज के पिंड की तरह।" ख़तीब का "अंधे नहीं देखते" वाला वाक्य उसी जगह का सिलसिला है।
📖 1975 → आज · दो दर्स, एक नतीजा
वाज़ में आए 1975 के सारे आँकड़े वीडियो में ख़तीब के कहे अनुसार ही छोड़े गए हैं, आज की क़ीमतें स्क्रीन के नीचे की नीली पट्टी में दी गई हैं। पैमाना यह है: आँकड़ा उस दिन के ज्ञान के अनुसार और लोगों के सामने तस्वीर खींचने के लिए कहा गया है; असल बात यह है कि मसले का सार न बिगड़े।
XVIII — वीडियो कैसे बना
आवाज़ असली, चित्र कोड से
आवाज़ वाज़ की 28 फ़रवरी 1975 की असली रिकॉर्डिंग है (Çınar Medya); इसे बदला नहीं गया। रिकॉर्डिंग की शुरुआत की अरबी दुआएँ वीडियो में नहीं ली गईं; वाज़ बिस्मिल्लाह और अल-बक़रा 2:21-22 से शुरू होता है। अरबी तिलावतें स्क्रीन पर अरबी लिपि में, और उपशीर्षक में सुआत यिल्दिरिम के अनुवाद के साथ दी गई हैं।
चित्र आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (Anthropic Claude) से कोड के ज़रिए बनाई गई चलती स्लाइडें हैं: घूमता परमाणु, दीर्घवृत्त कक्षा में सूरज और धरती, झोंपड़ी में जाता पत्थर और निकलते जवाहर, चालीस हज़ार की फ़ौज... स्क्रीन के नीचे की सुनहरी पट्टियाँ, ख़तीब जिस पल वाक्य कहते हैं, उसी पल रिसाला-ए-नूर में उसकी मुताबिक़ जगह दिखाती हैं; नीली पट्टियाँ 1975 के आँकड़ों की आज की क़ीमत देती हैं। ये ख़तीब के शब्द नहीं, स्रोत-टिप्पणियाँ हैं। उपशीर्षक सात भाषाओं में हैं।
📖 वीडियो में
| सुनहरी पट्टी | रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह (बदीउज़्ज़माँ सईद नूरसी); 70 जगहों पर। |
| नीली पट्टी | 1975 → आज: आँकड़ों की आज की क़ीमत; 13 जगहों पर। |
📖 रिसाला-ए-नूर में मुताबिक़ जगह · वीडियो कैसे बना
वाज़ की रिसाला-ए-नूर से तुलना में 102 जगहों पर मेल मिला: 8 हूबहू उद्धरण, 65 भावार्थ के रूप में नक़्ल, 29 समानांतर विचार। मुख्य जगहें: सोज़लर, तीसवाँ सोज़ (दूसरा मक़सद: ज़र्रा, अंधा आदमी, झोंपड़ी); लेमालर, तीसवाँ लेमा (इस्म-ए-अद्ल: मीज़ान; इस्म-ए-क़य्यूम); तेईसवाँ लेमा (तबीअत रिसाला); इशारातुल-इजाज़ (अल-बक़रा 2:21-22); मुनाज़रात (दिल और दिमाग़); शुआलर, मुनाजात (ज़ुहूर की शिद्दत)।
अवधारणाएँ
📖 वाज़ में आई अवधारणाएँ
क़िदम: कोई शुरुआत न होना; अज़ली होना।
बक़ा: कोई अंत न होना; अबदी होना।
क़य्यूमियत: अल्लाह का हर चीज़ को हर पल वुजूद में थामे रखना।
वाजिबुल-वुजूद: जिसका वुजूद अनिवार्य है; अल्लाह।
ज़र्रा: पुराने लोगों की ज़बान में परमाणु; सबसे छोटा कण।
पहलू (वज्ह): दिशा, जिहत।
मीज़ान: नाप, तराज़ू, संतुलन (अर-रहमान 55:7)।
मअकूसन मुतनासिब: विलोम अनुपात में।
मुहाल: जिसका होना असंभव हो।
तस्बीह: अल्लाह को हर कमी से पाक कहना; हर चीज़ का अपनी ज़बान में उसे याद करना।
स्रोत
📖 वाज़ के स्रोत
आवाज़ की रिकॉर्डिंग: Çınar Medya (YouTube)
आयतें: अल-बक़रा 2:21-22 · अन-नूर 24:35 · अल-इसरा 17:44 · अर-रहमान 55:7-13
रिसाला-ए-नूर: सोज़लर (तीसवाँ सोज़, पच्चीसवाँ सोज़, तेरहवें सोज़ का ज़ैल, दसवाँ सोज़) · लेमालर (तीसवाँ लेमा, तेईसवाँ लेमा) · मक्तूबात (तीसरा, अठारहवाँ, बीसवाँ मक्तूब) · इशारातुल-इजाज़ · मुनाज़रात · शुआलर (मुनाजात) · मुहाकमात · कस्तमोनू लाहिक़ा
विज्ञान के हवाले: शार्ल-यूजीन गुये (Frank Allen, The Evidence of God in an Expanding Universe, 1958 के हवाले से) · पियर लेकॉम्त दु नूई, Human Destiny (1947) · एम. एफ़. गुलेन, Yaratılış Gerçeği ve Evrim